True guru

असली गुरु कौन है?

  परम पिता परमात्मा की प्रेम परिपूर्ण आत्माएं एक प्रबुद्ध गुरु की खोज में लगी रहती हैं जो उन्हें मोक्ष प्राप्त करने में मदद कर सके। ऐसे अनेकों गुरु हैं जो अपने अनुमान से बनाई हुई साधना पद्धतियों के द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान बता रहे हैं। साधक के भीतर हमेशा यह प्रश्न रहता है कि वह सही गुरु की पहचान कैसे करे। गुणवत्ता की कसौटी के अभाव में वह किसी ज्योतिषी, कथावाचक, भगवाधारी या स्वयं घोषित संत को अपना गुरु मान बैठते हैं।


सत्य से अनभिज्ञ प्रत्येक शिष्य निस्संदेह मानता है कि उसके गुरु ही सबसे अधिक ज्ञानी हैं और उसे परमात्मा का साक्षात्कार करायेंगे। सत्य साधक केवल उपलब्धता या भावनाओं के आधार पर नहीं बल्कि शास्त्र सम्मत तथ्यों के आधार पर आध्यात्मिक गुरु चुनना चाहता है।

सुंदर काया, अद्वितीय दृश्य श्रृंगार और यहां तक कि मधुर भाषण कला में निपुण मात्र व्यक्ति भी आध्यात्मिक गुरु होने के योग्य नहीं है।



प्राचीन ग्रंथों में एक कथा प्रचलित है अष्टावक्र जी के बारे में,  जिनके बदसूरत शरीर में आठ कूबड़ थे, ज्ञान पिपासु सम्राट जनक के दरबार में आयोजित ज्ञान चर्चा में हिस्सा लेने गये। सभी उपस्थित ऋषि-मुनि उनके बदसूरत शरीर को देख तिरस्कारपूर्वक हंसे। अष्टावक्र एक पल रुके और ज़ोर से हंसे। हैरान जनक ने अष्टावक्र से पूछा कि सभी ऋषिगण आप पर हंसे लेकिन ऋषिवर आप क्यों हंसे? ऋषि अष्टावक्र ने उत्तर दिया कि राजन यहां उपस्थित सभी शरीर ज्ञानी हैं न कि आध्यात्मिक ज्ञानी। ये सभी मुझमें विद्यमान शाश्वत आत्मा से अनभिज्ञ हैं।


 "असली गुरु कौन है?" इस प्रश्न का सटीक उत्तर है कि जो शाश्वत सत्य अर्थात परमात्मा को जानने वाले हैं, वहीं असली गुरु हैं। तथ्य यह है कि गुरु स्वयं सर्वोच्च परमेश्वर हैं। चूंकि सृष्टि रचना के समय परमात्मा अकेले थे और उनके साथ कोई दूसरा मौजूद नहीं था। उनके अलावा शाश्वत सत्य को जानने वाले अन्य जन वो हैं जिन्हें स्वयं परमात्मा ने शाश्वत सत्य का बोध कराया। सत्य साधकों को यह संकेत समझकर ऐसे प्रबुद्ध गुरु की खोज करनी चाहिए जिन्होंने 'गुरु-शिष्य परंपरा' में सत्य ज्ञान को सीधे परमात्मा से जान कर एक गुरु से दूसरे गुरु में प्रवर्तन किया हो। 


तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि: श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् । (मुंडकोपनिषद् 1.2.12) अर्थात  ऐसे गुरु की शरण में ही जाना चाहिए जो सर्व ग्रंथों के ज्ञाता हैं और ब्रह्मनिष्ठ हैं। श्रीमद्भागवत  पुराण में 'गुरु' को उचित रूप से परिभाषित किया गया है, परम सत्य के साधक को एक प्रबुद्ध गुरु की शरण में जाना चाहिए जिसने शास्त्रों के सार और परमात्मा के शब्द रूप का साक्षात्कार किया है (शाब्दे परे च निष्णातं) और भौतिकवादी तृष्णा से अलग है। (श्री.भा.पु. 11.3.21)। इसी प्रकार भगवद गीता में संकेत है, पूर्ण सत्य साधक को तत्वदर्शी संत के पास जाना चाहिए और साष्टांग दंडवत प्रणाम कर निष्कपट  होकर प्रश्न करने से वो तत्वज्ञान उपदेश करेंगे क्योंकि उन्होंने सत्य से साक्षात्कार किया है (उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन:) (भ.गी. 4:34)।


एक प्रबुद्ध गुरु ऐसे शाश्वत उल्टे संसार रूपी वृक्ष की व्याख्या करते हैं जिसकी जड़ें ऊपर की ओर तथा शाखाएं नीचे की ओर फैली हुई हैं, जो तीनों गुणों द्वारा पोषित हैं। प्रबुद्ध गुरु उस शाश्वत वृक्ष के आधार पर परमात्मा तक पहुंचने में मदद करते हैं जिससे साधक को फिर से इस भौतिक संसार में नहीं लौटना पड़ता (भ.गी. 15.1-15.4)। गुरु हमेशा शिष्यों को व्यवहार में तीन प्रकार के गुणों की याद दिलाते हैं- सतगुण आत्मबोध के लिए, रजोगुण कर्म उन्मुख जीवन के लिए और तमोगुण अज्ञानता और बुरे कार्यों के लिए प्रेरित करते हैं।  साधक में आध्यात्मिक प्रगति के साथ गुणों में परिवर्तन आता है (भ.गी. 14:22-14:25)।
एक प्रबुद्ध गुरु नाशवान क्षर पुरुष ब्रह्म, अक्षर पुरुष और परम अक्षर पुरुष अर्थात अविनाशी पूर्ण परमात्मा का भेद बताते हैं (भ.गी. 15.16 - 15.17)। एक प्रबुद्ध गुरु मुक्ति और पूर्ण मोक्ष में स्पष्ट रूप से अंतर करने में सक्षम है। ॐ अक्षर का जाप करने वाले साधक को शरीर छोड़ने पर ब्रह्म के स्तर तक की मुक्ति प्राप्त होती हैं (भ.गी. 8.13)। जबकि "ॐ तत् सत्" पूर्ण परमात्मा का प्रतीकात्मक अभ्यावेदन है और इस सतनाम के विशिष्ट विधि से साधना करने से आत्मा पूर्ण मोक्ष प्राप्त करती है (भ.गी. 17.23)।

*गुरु की जांच परख*

*अनिवार्य गुण*

पूर्ण गुरु होने के अनिवार्य गुण हैं कि वह अपने शिष्यों की अपने से अधिक परवाह करते हैं। स्नेह, करुणा और सतज्ञान से उनको पोषित करते हैं। गुरु अपने शिष्यों को सांसारिक सुखों के बजाय मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रेरित करते हैं।

*मौलिक गुण*
गुरु मौलिक गुणों के भंडार हैं। एक कहावत है “गुरु कीजै जान के, पानी पीजै छान के” अतः गुरु को गुणों की कसौटी पर कसना आवश्यक है। सभी मौलिक गुण जैसे नैतिकता, निर्भयता, मन की शुद्धता, सद्बुद्धि, दान, इंद्रियों का अनुशासन, पवित्र संस्कारों का निर्वहन, शास्त्रों का शोध, आत्म अनुशासन, ईमानदारी, अहिंसा का अभ्यास, सत्यवादिता, क्रोध से मुक्ति, त्याग, शांति, आलोचना से बचना, सभी प्राणियों के प्रति करुणा, लोभ का अभाव, सौम्यता, शील, बेचैनी की कमी, उत्तम चरित्र, क्षमा, धैर्य, शुद्धता, घृणा से मुक्ति, अभिमान मुक्त होने चाहिए (भ.गी. 16.1-16.3)। गुरु को उत्कृष्ट रूप से इंद्रियों के सभी विषयों, इच्छाओं और लालसा से मुक्त होना चाहिए (भ.गी. 2.55)।

गुरु मानते हैं कि कर्म करना निष्क्रियता से श्रेष्ठ है और शरीर को बनाए रखने के लिए सभी वैदिक कर्तव्यों का निर्वहन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए गुरु सभी कर्तव्यों का निर्वहन करता है क्योंकि, इस प्रकार परमात्मा की सेवा की जाती है। इस तरह गुरु इस भौतिकवादी संसार के किसी भी प्रकार के मोह से बचते है (भ.गी. 3.8-3.9)। गुरु आत्म-केंद्रित हैं और भावनात्मक बंधनों से मुक्त हैं, खुशी और कष्टों में संतुलित हैं (भ.गी. 12.13 -12.14)।

*गुरु की भूमिका*

प्रबुद्ध गुरु को परम सत्य का ज्ञान पूर्ण परमात्मा से गुरु-शिष्य परंपरा से संबंध होने के कारण मिलता है। इसलिए गुरु पूर्ण परमात्मा के साथ एकीकृत है और अपने शिष्यों को सत्य से परिचित कराता है। गुरु आनंद का सागर है।  एक शिष्य के लिए गुरु, परमात्मा से कम नहीं है क्योंकि गुरु ने सत्य-चेतना द्वारा अज्ञानता से बंद आंखें खोली दी हैं और सांसारिक असक्तियों से दूर कर दिया है। गुरु की सतत संगत आत्म उत्थान के लिए प्रेरणादायक है। गुरु व्यावहारिक आध्यात्मिक प्रशिक्षण से शिष्य को दोष मुक्त, शुद्ध मन, भौतिक आशा, तृष्णा से परे बनाता है। गुरु शास्त्रों के रहस्य को प्रकट करता है जो अन्य साधक को अपूर्ण अस्पष्ट और विरोधाभासी लगते हैं। सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्ति के लिए गुरु की कृपा अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रबुद्ध गुरु ऐसे शिष्य को अपना सर्व आशीर्वाद प्रदान करता है जो उनके सभी निर्देशों का अक्षरतः पालन करता है और गुरु की सेवा पूर्ण निष्ठा से करता है। 

गौस्वामी तुलसीदास चेताते हैं 'गुरु बिनु भवनिधि तरइ न कोई'। गुरु एक माली की तरह है जो बीज रोपाई के लिए अनुकूल और सुरक्षात्मक वातावरण प्रदान करते हैं और फूल का खिलना स्वचालित रूप से होता है। इसी प्रकार गुरु सही आध्यात्मिक ज्ञान, प्रक्रिया और साधना के साथ शिष्य का पालन पोषण करते हैं। परम सत्य के साधक के लिए यह आवश्यक है कि वह प्रबुद्ध गुरु के चरणों में जाए और उसी तरीके से उसका अनुसरण करे जैसा गुरु करने को कहते हैं। कोई भी साधक स्व:निर्धारित गुरुओं की सहायता से शास्त्रों का अध्ययन कर ऐसी आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त नहीं कर सकता।

तत्वदर्शी संत जगतगुरु रामपाल जी महाराज आज विश्व के एकमात्र प्रबुद्ध संत हैं जिन्होंने परमात्मा कबीर साहेब द्वारा शुरू की गई गुरु-शिष्य परंपरा में संत गरीबदास जी महाराज के साथ प्रबुद्ध गुरुओं की वंशावली साझा की है।


आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। साधना चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8.30 बजे।


संत रामपाल जी महाराज जी इस विश्व में एकमात्र पूर्ण संत हैं। आप सभी से विनम्र निवेदन है अविलंब संत रामपाल जी महाराज जी से नि:शुल्क नाम दीक्षा लें और अपना जीवन सफल बनाएं।

अधिक जानकारी के लिए आप हमारी वेबसाइट पर जाएं 👇
www.jagatgururampalji.org

आध्यात्मिक ज्ञान की पुस्तक
✓जीने की राह या
✓ज्ञान गंगा



निःशुल्क पुस्तक डाउनलोड करने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें 👇


https://www.jagatgururampalji.org/jeene-ki-rah.pdf

Comments